पूल की एक मकड़ी। बस, यहीं से यह सब शुरू हुआ।

कारमेन गिल लास पाल्मास में छुट्टियाँ मना रही थीं, जब उस छोटे से जीव ने उनके शरीर में “मांस-भक्षी” नामक एक बैक्टीरिया पहुँचा दिया। कुछ ही दिनों में उनका शरीर सेप्टिक शॉक में चला गया और उनकी जान बचाने के लिए डॉक्टरों ने उन्हें कोमा में डाल दिया। जब वह सो रही थीं, तब उनकी नाक, होंठ, तालु और कई उँगलियाँ चली गईं। लेकिन किसी ने उनसे इस बारे में एक शब्द भी नहीं कहा।

कई हफ्तों बाद वह बार्सिलोना में जागीं, इस बात से अनजान कि उनका अपना शरीर किस दौर से गुजर चुका था। एक सामान्य दिन, उन्हें व्हीलचेयर में एक आईने वाली लिफ्ट की ओर ले जाया गया। वहीं, बिना किसी चेतावनी, बिना किसी तैयारी और पहले से कुछ भी समझाए बिना, उन्होंने पहली बार अपना प्रतिबिंब देखा। उनके होंठ नहीं थे। उनकी नाक नहीं थी। “मैं स्तब्ध रह गई”, वह आज भी याद करती हैं, उनके चेहरे पर तनाव उभर आता है।

आईने के सामने का वह क्षण अंततः एक ऐसे चिकित्सकीय निर्णय का शुरुआती बिंदु बन गया, जिसकी दुनिया में कहीं कोई मिसाल नहीं थी: ऐसे दाता से चेहरा प्रत्यारोपण स्वीकार करना, जिसने इच्छामृत्यु का अनुरोध किया था।
