नई दिल्ली, भारत में, चेतन कुमार सिर्फ़ इतना चाहते थे कि उनकी बेटियाँ फिर से स्कूल जाएँ। 😔उन्होंने वर्षों तक भारत के गाज़ियाबाद में अपने कमरे में बंद रहकर समय बिताया था, K-pop पोस्टरों से घिरी हुई, एक-दूसरे को दिए गए कोरियाई नामों के साथ, उस स्क्रीन के अलावा हर चीज़ से कटी हुई।
जब उन्होंने 4 फ़रवरी, 2026 से पहले के दिनों में उनके फ़ोन ज़ब्त कर लिए, तो उन्हें लगा कि वे सही काम कर रहे हैं।

निशिका 16 साल की थी। प्राची, 14। पाखी, 12। उन्होंने मिलकर अपने पिता को संबोधित एक आठ पन्नों का पत्र लिखा। “कोरिया हमारी ज़िंदगी है, हम इसे छोड़ नहीं सकते”, उसमें लिखा था। “आप नहीं जानते थे कि हम इसे कितना प्यार करते थे। अब आपने उसका सबूत देख लिया है।”
रात 2:15 बजे, सामने वाली इमारत से एक पड़ोसी ने उन्हें देखा। सबसे बड़ी खिड़की की चौखट पर बैठी थी। दूसरी ने उसे गले लगाया हुआ था। सबसे छोटी उन्हें पकड़े रहने की कोशिश कर रही थी। तीनों नौवीं मंज़िल से गिर गईं। 💔

“यहाँ जो कुछ लिखा है, सब पढ़ो क्योंकि यह सब सच है। इसे अभी पढ़ो!”
“मुझे बहुत अफ़सोस है।”
“मुझे माफ़ कर दीजिए, पापा।”
उनकी छोटी बहन, Devu, बच गई। बाकी ने उसे दूर धकेल दिया था क्योंकि वह उनकी दुनिया का हिस्सा नहीं बनना चाहती थी। यह कहानी हमें यह पूछने पर मजबूर करती है कि किशोर अपने ही घर के भीतर कितना अकेला महसूस करने लग सकते हैं।
