पालन-पोषण किए जाने का ऋण आखिर कहाँ तक जाता है?
कुछ देशों में, कानून के पास इसका पहले से ही जवाब है। यदि कोई बुज़ुर्ग माता-पिता अपना भरण-पोषण नहीं कर सकते और उन्हें पेंशन नहीं मिलती, तो उनके बच्चों को उन्हें गुज़ारा-भत्ता देना पड़ सकता है, भले ही अतीत में उन्हें छोड़ दिया गया हो या उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ हो।

कुछ लोगों के लिए, यह महज़ न्याय है। माता-पिता ने दशकों तक अपने बच्चों के लिए त्याग किया और जब वे अपने दम पर जीवन नहीं चला सकते, तो वे उस सहारे के हकदार हैं। दूसरों के लिए, यह एक जाल है। किसी का पालन-पोषण किया जाना आजीवन भावनात्मक और आर्थिक गिरवी नहीं बन जाना चाहिए, खासकर तब जब माता-पिता में से कोई एक कभी मौजूद ही न रहा हो।
क्या बच्चे पैदा करने से आपको बुढ़ापे में सहारा पाने का अधिकार मिल जाता है, या बच्चे का पालन-पोषण कभी भी आजीवन ऋण नहीं बनना चाहिए?

