जब उसके ऊपर धरती ढह गई, तब वह 105 वर्ष की थीं।
उनका घर कुछ ही सेकंड में ढह गया, लेकिन वह मलबे के ढेरों के बीच जीवित रहीं, ऐसी छोटी-सी जगह में जहाँ मुश्किल से साँस लेने की जगह थी। वह 24 घंटे तक बिना हिले-डुले वहीं रहीं, जबकि बाहर बचाव दल परत-दर-परत खुदाई करते रहे और उन्हें पता नहीं था कि उन्हें कोई शव मिलेगा या चमत्कार।


उन्होंने चीख नहीं मारी। वह चीख नहीं सकती थीं। वह बस इंतज़ार करती रहीं, अपने ही घर का भार अपनी छाती पर महसूस करते हुए, जबकि घड़ी उनके खिलाफ चल रही थी और हर बीतते घंटे के साथ उम्मीद कम होती जा रही थी। बचावकर्मी सेंसरों से मुश्किल से महसूस की जा सकने वाली जीवन की एक हल्की-सी आहट के सहारे काम करते रहे और आखिरी कुछ मीटरों में अपने हाथों से खुदाई की, ताकि उन्हें चोट न पहुँचे।


जब उन्होंने आखिरकार आखिरी ब्लॉक हटाया, तो उन्होंने उन्हें होश में पाया। एक ऐसी महिला, जिसने एक सदी से अधिक जीवन जिया था और जो 24 घंटे तक अपनी जिंदगी के किसी भी अन्य क्षण की तुलना में मौत के अधिक करीब रही थीं।
